गर्गवंशीय कैसे हुए

आधार-वाजबुल अर्ज (पारिवारिक इतिहास)

नकल वाजवुल अर्ज मोहाल सारंगपुर तालुका खपराडीह परगना बरौसा तहसील व जिला सुलतानपुर हकीयत पोख्तेदारी मसमूले मिसिल बनदोबस्त साविक।

दफा-1

जिक्र तवारीख गाँव त्रोतायुग में कल्व औतार श्री महराज रामचन्द्र जी की राजा दशरथ ने किसी जगह यज्ञ कराने का इरादा किया और गर्ग श्रृषेश्वर को वास्ते कराने यज्ञ के अयोध्या जी में बुलाया। बाद खत्म होने यज्ञ के कुश भौन नगर में जो करीब अयोध्या जी के था। गर्गश्रृषेश्वर ने अपना माबुद करार दिया जोकि अब मौजा कुशमाहा मौसूम व परगना हवेली अवध में वाके है। और क्षत्राीय सूर्यवंश ने हस्व कायदा उस युग के अपनी कन्या गर्गजी को दिया। उस कन्या से जो औलाद पैदा हुए गर्गवंश मौसूम हुए और कुश भवन नगर में मुसकिन गजी रहे। जमाना सुल्तान मुहम्मद गोरी में भारामल वो कीरतशाह पिसरान राम शाह गर्गवंश ने कौम भरों का कत्ल करके मौजा मूंगर तालुका जयसिंहपुर में भारामल व मौजा निहांवा में कीरतशाह ने सकूनत अख्तियार किया कौम गर्गवंशी साकिनान परगना सुलतानपुर व बरौसा व परगना पश्चिम राठ व परगना अल्देमऊ व मिझौड़ा औलाद राम शाह में है। मोकलशाह बेटा भारामल मजकूर का आली हौसला व साहब इरादा था। विरादरांची जमैयत के कौम भरो को कत्ल करके देहात तालुका गंगियों व तालुका हसनपुर व तालुका दियरा वगैरह परगना सुलतानपुर व बरौसा व परगना पश्चिम राठ व अल्देमऊ व मिझौड़ा अपने कब्जे में लाया। सरतेज राय व जयसिंह राय पिसरानमोहनशाह वल्द मोकलशाह ने अपने नाम सैंती गाँव आवाद किया। चुनाचें मौजा सरतेजपुर तालुका गंगियों में औलाद सरतेजराय, जयसिंहपुर में औलाद जयसिंह राय हिनोज मौजूद रहें वो अवलाद जो काहबराय (कक्कूराय) पिसरसानी मोकलशाह मौजा परसौंहा में अब तक कायम है। वादहूँ रियासत मुंजुमिबुले मोकिलशाह में खलल पैदा होना शुरू हुआ। नम्बरवार कुछ देहात राजा हसनपुर के दखल मंे व देहात राजा कुड़वार के कब्जे व राजा दियरा के कब्जा में व तालुकेदार गंगेव के दखल में चले गये वो औलाद भारामल के रियासत से महरूम हो गये। कीरतशाह पिसरशानी रामशाह ने अपने और खुश इंतियामी से अपनी रियासत को खूब तरक्की दिया। जो मोतिमराय व छीतमराय उसके दो बेटे हुए। छीतमराय के औलाद में चन्द्रशक्स मौजा बझना तालुका जैसिंहपुर में मौजूद हैं मगर रियासत से बेदखली में जो मोतिमराय के दो बेटे में एक ऊधनराय दूसरा महगंू राय हुए। औलाद तासराय अव्वल ऊधनराय के मौजा डीह धग्गूपुर व मौजा बनमई व मौजा कारेबन व मौजा सिकरा में अपने हकीयत जमीदारी पर काविज है व औलाद नाथराय पिसरमाले ऊधन के मोहाल पीढ़ी में दाखिल है मंहगूराय के चार बेटे साहव अवलाद हुए चुनांचे अजब या आजितराय के अवलाद में मालिकान मोहाल गौरा तालुका सीढ़ीपुर के हैं व साकवाहन (शाहभान) की औलाद मौजा पचगवां गड़ौली देवकली में अपनी हकीयत पर काबिज है। औलाद दयाम सिंह की मुसलमान हो गये उस साख में जमीदारान सोनारा के है। मगर हकीयत से बेदखल हैं दलहू राय पिसर चहारूम महगूंराय के चैथी पुस्ति में करमाशाह हुए उसके दो बेटे हुए एक रायभान की औलाद में पोख्तेदारान मौजा परसड़ा के हैं दूसरा वीरभान के छः बेटे हुए। मुजुम्ले उनके कनकराय की औलाद में पोख्तेदारान मोहाल विझूरी। रूप नारायन जुज औलाद में (बेलगरा के अतिरिक्त) पोख्तेदारान मोहाल मदारभारी व पूरे दरबार व तेरिया व पमोली परगना सुलतानपुर व मैहर व भदार परगना पश्चिराठ व मिझौडा। व जीव नारायन व केशवदास की औलाद में पोख्तेदारान मौजा अमिलिया व दामोदर दास की औलाद में पोख्तेदारान मौजा पिंगिरियांवा कोइलहा व चन्द्रसक्स मौजा सारंगपुर हैं।

हरीराम पिसरसुम दलहूराय के दो जौजा थी। जौजा अव्बल की औलाद में पोख्तेदारान मौजा बैथू... तालुके दारान सीढ़ीपुर व खपराडीह की व जौजे सानी (दूसरी स्त्राी) की औलाद में पोख्तेदारान मोहाल सारंगपुर के हैं।

करीब एक हजार वर्ष हुआ कि दुलहूराय ने मौजा बदर्शी में कोट बनवाने का इरादा किया। बनजर तजवीज खुशखुमिया यह अमख कराया कि जिसका नाम सारंग हो उसके हाथ से इस कोट की नीव कायम कराई जाये तो मुबारक हैं। वक्त खुश्क था जमैयत मौजूदा में इस नाम का कोई शक्स न था। इत्फिाक एक बारात जाती थी। उसमें दरियाफ्त करने पर मालूम हुआकि दुलहिन का नाम सारंग है। उसी से बुनियाद कोट की कायम कराइ्र व मुनासिब उसके सारंगपुर नाम उसका रखा। अर्षा चार सौ वर्ष का हुआ बखरक्षत कसी में तरका करीना के हरीराम वगैरह उसकी औलाद ने मौजा सारंगपुर व हीड़ी वगैरह 27 मौजा में हिस्सा पाया। वादचन्द्ररोज के औलाद हरीराम वगैरह वो औलाद दामोदरदास ने गौवंट कर लिया मुताबिक उस बटवारा के मौजाअहिरानी को खांदीराय प्रेेमशाह भूपालशाह आदि पिसरान हरीराम ने वजरिये बेक हासिल कियां इस समय से मोहाल हाजा में मौजा मुन्दर्जा सामिल है।

दिनांक 10.05.05 ग्राम गुुड़बड़ श्री राजाराम सिंह द्वारा अनुवादित वाजुबुल अर्ज शाख भारामल जिकर तवारीख खानदान गर्गवंशी मोकलशाह। इस हिकायात को लोग इस तरह बयाॅ करते कि खानदान गर्गवंशी मौजा कुशमाहें जो इस वक्त परगना हवेली अवध जिला फैजाबाद में बसे हैं। वहाँ से श्रीमान् राम शाह के दो लड़के इस जिला यानी सुलतानपुर के सर की (मिश्र पूर्व के) हिस्से के वक्त आये उस वक्त इस जवार में अकवाम भरो की आवादी थी। जिनके पुराने डीह बकसरत अब भी मुखतलिफ मोकामात पर पाए जाते हैं। चुनान्चें राम शाह के दोनों लड़कों ने दरिया गोमती के सुमाल (उत्तर) में भरो को मगलूब (हराकर) करके मसकन गुजीन हुए। कुशमाहें से भारामल व कीरतशाह दोनों भाई जो निहायत दिलावर व खुश इकलाख व लासानी शक्स थे। उन्होंने अपने नाम के निशानात तामिर करवाया। भारामल के निशानात वागात व तालाव नाले इलाके में अब भी मौजूद है। कीरतशाह मौजा निहावां में अपनी सलतनत की बुनियाद डाली और भारामल मौजा मूंगर में अपनी राजधानी कायम की। भारामल के एक पुत्रा मोकलशाह हुआ। जिन्होंने अपने नाम से मोकलपुर आवाद किया। मोकलशाह अर्सें तक निहायत अदल व इंसाफ व राजनीत के वसूलों पर राज किया। उनके खानदान वालों ने चन्द मोकामात पर अपने-अपने नाम की वस्तियां आवाद की जैसे जैसिंह राय ने जयसिंहपुर सरतेज राय ने सरतेजपुर, रमईराय ने रमचनपुर, उदय सिंह राय ने उदयसिंहपुर वंशी राय ने वरसों में धुमराय (धुन्ध) ने धूंधू, खड़गराय ने खड़गपूर जिसमें आज तक खड़गवारा व बाग मौजूद हैं मगर जामाना हरवक्त एक सा नहीं रहता हमेशा तामीर व तनज्जुल हुआकरता हैं। जिसका अरूण (उगना व बढ़ना) होता हैं उसका जवाल (पतन) भी जरूरी ही है। जैसे किसी शायर ने कहा हैं।

जमीं चमन गुल खिलाती हैं क्या-क्या
बदलता है रंग आसमां कैसे-कैसे
है कब्र द्वारा-न होगे निशा कैसे
हुए नामवर बेनिशां कैसे-कैसे,
जमी खा गयी नौजवां कैसे-कैसे।
है कब्र द्वारा न गोरे सिकन्दर,
मिटे नामियों के निशा कैसे-कैसे।

चुनान्चें उसी जमाने की गरदिस ने मोकलशाह पर मुअस्सर होकर बददुआ दिलवाई और चैहान वंश क्षत्रिय जो कत्ल मंे सम्भर मुल्क से आकर दरिया गोमती के जनूब (दक्षिण) व मुगरिव (पश्चिम) अपनी मुस्तकिल रियासते कायम कर ली थी वे लोग बड़े जोरो के साथ हमला किया।

मोकलशाह ने निहायत दिलेरी के साथ मुकाबला डटकर किया। मगर जावाजा (सफल) न हुए आखिरकार उन क्षत्रिय चन्देलों ने खानदान मोकलशाह को तबाह व बर्वाद कर दिया। बेचारे खानदान मोकलशाह वाले पर तबाही हालत महदूदी चन्द्र मुखतलिफ मुकामात को चले गये जैसे कि परसराय परसौ हें, रेवनाशाह रेवना करीशाह उत्तरवार लाल बहादुर सिंह संग्रामपुर। इस तरह और भी लोग बाहर चले गये जो लोग अपने तालुका के अन्दर रह गये वे लोग अपने पहले की तरह अपनी मिलकियत कायम न कर सके मगर अपना कब्जा कुछ न कुछ बराबर किये गये। जब सरकार बहादुर फजर गौरमेन्ट के गैर हुकूमत इस सूबे अवध की सरजमी पर आई। तब मजकूर रसीद गर्गवंशियों ने जमाना बन्दोबस्त साविक कानूनी में दादख्वाह होकर किसी न किसी तरह अपनी गुजर औकात व जरिए डिग्री मातहती कब्जेदारी व देहदारी सितम पोख्तेदारी सीर वगैरह हासिल करके काविज व मुतस्सरफ हुअ और खानदान कीरतशाह वाले पहले ही शाह हिन्दसे इम्दाद व इत्दार हासिल करके तालुका कायम कर लिया। बावजूद इस पर भी चैहान वंशी क्षत्रियों ने मुतवातिर हमले किये औंर अल्बत्ता कुछ हिस्सा इलाका कब्जा कर लिया मगर खानदान पर इस कदर असर न पड़ा जैसे कि मोकलशाह का जमाना तकरीबन सात सदी हुआ होगा मौजा बझना में करिया देवता जिनकी प्रस्तिस (पूजा) होती हैं करिया देवता का मसहूर इमारतगाह हैं यहाँ महीना अगहनव फागुन व बैसाख के शुक्ल पक्ष में मंगल के दिन बड़ा भारी मेला हुआ करता हैं औंर यहाँ पर जुमला गर्गवंशी इकट्ठा होकरअपनी कौमी तरक्की के लिए आपस में मसविरा करते हैं अब रफ्ता-रफ्ता कामयाबी की की सूरत नजर आ रही हैं क्योंकि आपस में निहायत मोहब्बत व इकलाख व मेहनत हमदर्दी रखते है। जिसको किसी सायर ने सच कहा है।

मुनहसर है पाँच बातों पर तरक्की कौम की सत्य बादी, हिम्मत, इस्तकलाल, मेहनत, एक दिली। यह लेख लगभग 150 वर्ष पहले का हैं।

वाजवुज अर्ज के अतिरिक्त दिनांक 01.07.05 को ग्राम बनमई जिला सुलतानपुर के श्री राम सिंह द्वारा ज्ञात हुआ कि विभाण्डक ऋषि के पुत्रा श्रृंगी ऋषि थे उनकी दो शादी हुई थी।

प्रथम स्त्राी से 1. गर्गाचार्य पुत्रा तथा गार्गी पुत्राी

दूसरी स्त्राी से सुमन्त पैदा हुए।

2. सेजरा अथवा कुर्सीनामा

जमीदारी विनास के समय से बटवारे आदि में पेस किए गये सेजरे की प्रमाणित नकल आदि के आधार पर तथा नीचे की पीढ़ी प्रत्येक ग्राम में जाकर वहाँ के जानकार लोगों से जानकारी लेने के बाद लिखा गया।

अल्प इतिहास

गर्गवंशी क्षत्रियों का मूल उद्गम स्थान ग्राम कुशमाहा निकट दर्शन नगर अयोध्या जिला फैजाबाद है। यहाँ गर्गवंश में राम शाह उत्पन्न हुए इनके दो पुत्रा भारामल व कीरतशाह लगभग 800 वर्ष पहले वहाँ से चलकर वर्तमान जिला सुलतानपुर के उत्तर, सुलतानपुर सेमरी रोड़ पर सुलतानपुर से 20 किमी पर पावर हाउस देवरार भटमई के नजदीक ग्राम मूंगर में भरामल तथा ग्राम निहावां में कीरतशाह मझुईनदी के किनारे अपना कोट बनवाया यद्यपि बजबुलअर्ज दफा 1 जिक्रतवारीख मौजा सारंगपुर की नकल जो 1934 की निकाली गयी है और अंग्रेजी शासन काल के पहले की सन् 1776 के लगभग की बुजुगों के द्वारा तैयार कर मुसलमानी शासन काल में पेश की गयी थी जो आज भी मुहाफिज खाना कलेक्ट्रट सुलतानपुर व तहसील में उपलब्ध है उसमें भारामल और कीरतशाह के आगमन का समय जमाना सुलतान मुहम्मद गोरी ई. 1001 दिखाया गया है। किन्तु इतिहास के साक्ष्म के अनुसार मुहम्मद गोरी का समय 11वीं शदी के अंत और 12वीं शदी के प्रारम्भ का हैं इस प्रकार 800 वर्ष तो अवश्य हो गया होगा।

ये दोनों भाई यहाँ के मूल निवासी भरों का कत्ल करके अपने पराक्रम से रियासत दियरा, हसनपुर, तालुका गगियों आदि परगना बरौसा सुलतानपुर व परगना पश्चिम राठ आदि को अपने अधिकार में ले लिया। दोनो भाईयों के वंशज-भरामल के पुत्रा मोकलशाह से मोकलशाही व कीरतशाह से कीरत शाही के वंशज के नाम से विकसित हुए।

कीरतशाह के वंशज 7 पीढ़ी तक ग्राम निहावाँ में आवाद रहे उसके बाद वहाँ अब गर्गवंशी क्षत्रिय नहीं है कीरतशाह के कोटके अवशेष ऊँचे सथल के रूप आज भी ग्राम के दक्षिण स्थित हैं अब वहाँ ब्राम्हण व यादव आदिआवाद है। किन्तु कुछ जमीन आज भी ग्राम डीह व पलिया आदि के गर्गवंशी क्षत्रियों के कब्जे में हैं।

ग्राम निहावां से बढ़ने के बाद कीरतशाही वंश में कई पीढ़ी बाद उत्पन्न पड़ोसी ग्राम धग्गूपुर के पूज्यनीय बाबा रूद्र प्रताप सिंह द्वारा सन् 1927 ई. में गर्गवंशी क्षत्रियों के ग्रामों और जिलों की खोज की गयी उसके अनुसार कीरतशाही वंश में जिला जौनपुर मंे 13 ग्राम बरपुर, लेदुका, अगरौरा दरियांवगंज धौकलगंज महनपुर जमुनीपुर सुलतानपुर बेलहटा हमीनपुर नरौली राम पुर आदमपुर आदि ग्रामों में गर्गवंशी क्षत्रिय आवाद हो चुके थे जिनका सेजरा या वंशावली उनके द्वारा दिनांक 16/17/18 जनवरी सन् 1940 को तैयार की गयी। इसके पश्चात गर्गवंशी क्षत्रिय संगठन कायम हुआ और बिरादरी के कुछ लोग युवराज सिंह आदि प्रत्येक ग्राम में जाकर चिट्ठा रजिस्टर तैयार किया उनके समय में कुछ (लोग और ग्रामों के बीच में जोड़ना है। युवराज सिंह आदि प्रत्येक ग्राम मे जाकर चिट्टा राजिष्ट तैयार किया उनके समय में कुछ और ग्रामों में गर्गवंशी क्षत्रियों का विवरण मिला जैसे छुन्छे रामपुर आदि।

तत्पश्चात लेखक के द्वारा दिनांक 29/5/05 से दिनांक 2/6/05 तक मोटरसाइकिल से लगभग प्रत्येक ग्राम का भ्रमण किया गया और सेजरा (जो जिला जौनपुर में कुर्सी नामा के नाम से जाना जाता है।) तैयार किया गया ऊपर की पीढ़ी कासेजरा श्री रूद्र प्रताप सिंह द्वारा तथा नीचे की पीढ़ियों का लेखक के द्वारा तैयार किया गया। दादा रूद्र प्रताप सिंह उर्फ नीमर सिंह ग्राम धग्गूपुर ने अपने भ्रमण रजि. में दिनांक 20 नवम्बर, 1927 को लिखा हैं कि ग्राम डीह में आसकरनराय के चैथे पुत्रा लोहंगराय की शाख पहले चैथी पीढ़ी पर बेवंश दिखा दी गयी थी किन्तु जिला जौनपुर के ग्राम आदमपुर जाने पर अवगत हुआ कि लोहंगराय की चैथी पीढ़ी में ललकराय के पुत्रा वाहरदेव शाह की कोई रिश्तेदारी बरपुर में थी ये यही से जाकर वहाँ आवाद हुए और बरपुर में अपना कोट बनवाया और वहीं से इनके वंशज अन्य ग्रामों में आवाद हुए उस समय वहा। चमन सिंह चनमनिहाँ ठाकुरों की जिमीदारी व तालुकेदारी थी। उनका 5 कोस में तालुका था। सम्पूर्ण क्षेत्रा पर बाहरदेव शाह का अधिपत्य हो गया। कुछ लोगों का मानना है कि उक्त बाबा बाहरदेव शाह तीर्थ यात्रा पर जाते समय नीलामी ले लिया और वहाँ आवाद हुए।

लेखक के भ्रमण के समय कुछ और ग्रामों में विकसित होने वाले गर्गवंशी क्षत्रियों का विवरण मिला जिनका वर्णन वंशावली के अन्तर्गत लिखा गया हैं लेखक के भ्रमण के समय यहाँ के सभी ग्राम आवास और निवास के सम्बनध में उच्चकोटि के मिले उन ग्रामों में यहाँ के तरीके से ऐसा कोई संगठन नहीं कायम है कि गया जगन्नाथ स्वामी के भात आदि अवसरों पर सब इकट्ठा हो। हाँ कुछ ग्रामों में ऐसे लोग भी मिले जिनका स्नेह अपनत्व और उत्साह प्रशंसनीय हैं। आदमपुर रामश्रृगार सिंह के ही ऊपरी साख से बिभाजित लेदुका के स्व. हुवेदार सिंह के पुत्रा राय मुन्ना सिंह से दुवारा जाने पर एक कुर्सी नामा भी देखने को मिला जिससे यहाँ से ले जाया गया सेजरा टैली किया गया। दोनों में साख लोहंगराय ही अंकित रही।

भ्रमण के समय लेखक को यहाँ से जाने और वापस आने तक में 550 तथा दुवारा 425 किलोमीटर मोटर साईकिल चलानी पड़ी और कभी नरौली घाट कभी बेलवा घाट कभी रामपुर घाट उतर कर ग्रामों का भ्रमण किया गया। भ्रमण के समय बरगाँव के हमारे मामा के पोते (नाली) श्री संजय सिंह का विशेष सहयोग रहा। मैं प्रतिदिन संजय के साथ प्रातः 7 बजे से सायं 7 बजे तक भ्रमण करता था। केवल एक रात्रि निवास ग्राम रामपुर में पालीवाल ठाकुर हवलदारसिंह के यहाँ तथा एक रात्रि अगरौरा के पूर्व प्रधान श्री वासदेव सिंह गर्गवंशी के यहाँ किया। इनका स्नेह और प्रबल उत्साह वर्धन अविस्मणीय हैं ग्राम लेदुका के नम्बरदार श्री शिवपूजन सिंह ने भ्रमण के समय बड़ा सहयोग दिया और साइकिल से कई ग्रामों में जाकर परिचय कराया और सेजरा लिखवाया पूरे सभी ग्रामों में इतना भ्रमण शील और एरिया तथा व्यक्तियों की जानकारी रखने वाला कोई दुसरा नहीं मिला। दूसरे राउन्ड में भी 4 दिन तक ये साथ रहें। ग्राम नरौली में श्री समर बहादुर सिंह अध्यापक से सम्पर्क हुआ और वे इतना प्रभावित हुए कि पूरे जौनपुर जिले में आवासीय गर्गवंशी क्षत्रियों की वंशावली स्वंय मुद्रित कराने का संकल्प लिया।

विदित होकि गर्गवंशी क्षत्रियों के मूल देवता शंकर जी है इन्हें कारेदेव के नाम से जाना जाता हैं जहाँ भी गर्गवंशी क्षत्रिय कई ग्रामों में है वहाँ कारेदेव की स्थापना की गयी है। गर्गवंशी क्षत्रिय के मूल उद्गम स्थान ग्राम कुशमाहा में कारेदेव की स्थापना की गयी हैं। वहाँ से जब भारामल व कीरतशाह मूंगर और निहावां में आए तो ग्राम बझना में भी कारेदेव की स्थापना कराया और अब यहाँ क्षेत्राीय गर्गवंशी क्षत्रियों के सहयोग से स्व. श्री युवराज सिंह ग्राम पूरे दरबार पो. दहेगा जिला फैजावद वर्तमान जिला अम्बेदकर नगर के प्रयास से उनकी अध्यक्षता में कारेदेव के दक्षिण तरफ भब्य हनुमान मन्दिर का निर्माण कराया गया। जिसके परिसर की वाउन्डरीवाल आदि के निर्माण के समय तथा गर्गवंशी क्षत्रिय समाज सेवा समिति के संविधान निर्माण तथा रजिस्ट्रेशनसंबंधी मीटिंग की अध्यक्षता जिला मिर्जापुर को गर्गवंशी क्षत्रिय पूर्व खण्ड विकास अधिकारी भीटी जिला अम्बेदकरनगर द्वारा की गयी।

1
मार कीर्ति की प्रचण्ड वायु के महानपूत,
गर्गवंश का तुम्हे प्रणाम है-प्रणाम है।
कारे देव की विशाल वाहिनी के पंचदूत,
आप को समग्र क्षेत्रावास का प्रणाम है
राम भक्त युवराज के हृदय के शक्तिश्रोत,
राम की कथा में इस धाम को प्रणाम है।
कहते फुलौना शिवधाम के कथा महंत,
बझना प्रवासी भक्तराज को प्रणाम है |

2
गर्गवंश के महान तेग को पुकारूँ आज
शौर्य कीर्ति-साधना के पूज्य कुल देव है।
कुश माहे-कुशपुर और कुश वासियों की,
सांस-सांस के प्रतीक पंच ”महादेव“ है।
मार कीर्ति के सुतीर्थ कुशपुर बझना में
लोक पर लोक के सुधारक-सुसेव्य है
कहते फुलौना शिव धाम के कथा महन्त
गर्ग राज्य भूमि के महेश कारे देव है |

सुलतानपुर जिले में जो कारेदेव की स्थापना हुई हैं वहाँ गर्गवंशी क्षत्रिय स्वंय अपनी बच्चों का मुण्डन संस्कार करवाते है तथा उनकी लड़कियों के नवजात शिशुओं के मुण्डन तो निश्चित रूप से यही कारेदेव के स्थान पर होता है। कारेदेव के स्थान के दक्षिण हनुमान मन्दिर से लगाहुआ दक्षिण दिशा में वर्तमान ब.स.प. विद्यायक क्षेत्रा जयसिंहपुर श्री ओ.पी. सिंह पुत्रा स्व. री राम समरथ सिंह पो. रोहियाना के प्रयास से 5 लाख 35 हजार रुपए सरकार द्वारा प्रदान कराया गया तथा भब्य रैन बसेरा बनकर 2004-2005 मंे तैयार हो गया और यह स्थान पर्यटक स्थल भी घोषित हो चुका है।

लेखक के भ्रमण के समय जिला जौनपुर के ग्राम बेलहटा में भी कारेदेव की स्थापना का स्थान मिला अभिलेख के अनुसार जौनपुर में गर्गवंशी क्षत्रियग्राम डीह से आसकरन राय के चैथे पुत्रा लोगहंराय की साख से आवाद है। लेकिन वहाँ के लोगों का कहना हैं कि पूर्वज खपराडीह से आये हैं यह सम्भव भी हैं डीह और खपराडीह में जो फर्क है खपराडीह तालुका था सम्भवतः ग्राम डीह तालुका खपराडीह के स्थान पर डीह छूट गया केवल खपराडीह का ही प्रचलन रह गया अथवा ऐसा भी सम्भव है।

कि ग्राम डीह से असकरन राय के प्रथम पुत्रा जैतराय के वंशज खपराडीह के बगल ग्राम इंती में आवाद हुए और अभी भी मौजूद हैं आसकरन राय के प्रथम पुत्रा जैतराय के शेष वंशज आज भी ग्राम डीह तथा कारेबन आदि में आवाद हैं इनके वंशज ग्राम कारेबन से जाकरजिला जौनपुर के ग्राम दुमदुमा में जो सरपतहा थाना और समोधपुर के करीब है आवाद हो गये हैं तथा जिला जौनपुर के ग्राम दरियांव गंज से स्व. एस.डी.आई. चन्द्रभान सिंह के पुत्रा तथा भाई सुर्जभान सिंह आदि जिला सुलतानपुर सूरापुर के उत्तर पश्चिम लगभग 5 किमी. पर ग्राम करपी पो. हमजा पठान में आवाद हुए हैं तथा आसकरन राय के दूसरे तथा तीसरे पुत्रा धर्मगज शाह और भूपतिशाह के ग्राम धग्गपुर धौरहरा महमूदपुर आदि गाँव आवाद हैं।

बहुत सम्भव है कि आसकरन राय के चैथे पुत्रा लोहंग राय के प्रथम पुत्रा के वंशज कनका जिस तरह खपराडीह के बगल के गाँव इंती में आवाद हुए उसी तरह उनकी साख के वंशज खपराडीह में आवाद हुए हों और वहीं से ललकराय के पुत्रा वाहरदेव शाह वरपुर गये हो यही कारण होगा कि जब डीह धग्गूपुरका पुस्तिनामालिखा जाने लगा तब लोहंगराय की चैथी पीढ़ीको बेवंश दिखा दिया गया। जिसका स्पष्टीकरण श्री रूद्र प्रताप सिंह के जिला जौनपुर के ग्राम आदमपुर जाने पर हुआ।

भ्रमण के समय लेखक को जिला जौनपुर की भौगोलिक स्थिति के अनुसार प्रायः गर्गवंशी क्षत्रियों के सभी ग्राम मुख्यालय से उत्तर-पश्चिम कन्जा तथा बक्सा ब्लाक के आस पास हैं कुछ ग्राम गोमती नदी के उत्तर कुछ दक्षिण कुछ पूरब तथा कुछ पश्चिम में स्थित हैं कुछ ग्राम गोमती तथा पीली नदी के बीच स्थित हैं पवित्रा गोमती नदी सूर्यवंशी क्षत्रिय राजा इच्छ्वाकु के द्वारा लाई गयी हैं जिसके दोनों किनारे पर जौनपुर जिले के गर्गवंशी क्षत्रिय के ग्राम स्थित हैं गर्गवंशी क्षत्रियों का गोत्रा और वंश दोनों ही गर्ग हैं यद्यपि गर्ग गोत्रा में अन्य जाति ब्राह्मण और वैश्य भी आते है किन्तु क्षत्रिय ही गोत्रा और वंश दोनों के अन्तर्गत आते हैं ग्राम दरियांव गंज में भी कारेदेव की स्थापना की गयी है।

लोहंग राय के पुत्रा बाहरदेव शाह के वंशज में ग्राम आदमपुर में बड़े बहादुर लोग पैदा हुए उसी में ठाकुर अमर सिंह का नाम बहुत प्रसिद्ध हैं ये बागी थे इनके 5 लड़कों में सबसे बड़े लड़के जानकी थे दोनों लोग 1857 में अंग्रेजों के छक्के छुडा दिए और रामपुर घाट से वापस कर दिया दुबारा चढ़ाई में जानकी को काला पानी हो गया तथा सभी लोग गाँव छोड़कर भागगए। अमर सिंह की फुआ की शादी रियासत गंगापुर में हुई थी जब ग्राम आदमपुर आदि नीलामी पर चढ़े तो उनकी फूआ द्वारा 3 ग्राम नीलाम ले लिए गये और बाद में अपने भतीजों को दे दिए गये तब दुबारा इन ग्रामों में गर्गवंशी क्षत्रिय आवाद हुए। लेखक के 11 वर्षों के अनवरत प्रयास से जिला जौनपुर के गर्गवंशीयों की वंशावली तैयार की जा सकी जो गर्गवंशी चार्ट में दी जा रही है।


गर्ग कौन थे


1. पुराना लेख

लगभग 150 वर्ष पुराने लेख का एक पन्ना जो कि चन्द्ररेज सिंह निवासी ग्राम धग्गूपुर से प्राप्त हुआ था उसके आधार पर

प्रथम ब्रह्म अज अखन्ड अमाया इच्छा करि पुरुष उपजाया ||1||
पुरुषेच्छा ते प्रकृति प्रभेवा प्रकृति ते भयो महात्त देवा ||2||
महातत्व ते भो निरंकारा निरंकारा ते प्रणव निहारा ||3||
प्रणव ते भयो तीन गुण राउ सत रज तामस प्रगट प्रभाउ ||4||
त्राय गुण की भाखौं औलादी जिनते भा तनु अनित उपाधी ||5||
सतते वासुदेव चितजानो और चैदहों देव पिछानो ||6||
रज गुण ते ब्रह्म बुधि भयऊ दक्षौवायु इन्द्री दस जयऊ ||7||
तामस ते शिव जानो राई अहं अन्तःकरण लखाई ||8||
अहंते भा अकाश लहि पोला उपजे श्रवण सुनत जै बोला ||9||
नभते भई पवन अस्पर्सा तासोंमुक दृग रूपहि हर्षा ||10||
अग्नि ते जल रसनारस चाहै जलते पृथ्वी गन्ध जोलाहै ||11||
यकते एक प्रकट है आई जब सिमटै तब जाई समाई ||12||

दोहाः
सतरजतम बुधि चित अहं। शब्द अस्परश रूप ||
रसन गन्ध मिलि गांठिपरि। तब उपज्यो मनु भूप ||

चैपाईः स्वाम्भू मनु अरू सत रूपा जिनते भै नर श्रृष्टि अनूपा ||1||
नूप उत्तान पाद सुत जासू धुर्व हरि भक्त भयो सुत तासू ||2||
लघु सुत नाम प्रियवर्त जाही वेद पुराण प्रशंशत ताही ||3||
देव हुति पुनि तासु कुमारी जो ऋषि कर्दम की प्रिय नारी ||4||
आदि देव प्रभु दीन दयाला जठर भयी जेहि कपिल कृपाला ||5||
साख्य शास्त्रा जिन प्रकट बखाना तत्व विचार निपुण भगवाना ||6||
तेहि वंशज कात्यायन भयऊ जेहि कुल जनम गर्ग रिषि लययू ||7||
गर्गविवेक समुन्दर समाना महिमा जासु न जाय बखाना ||8||
धनुर्वेद ज्योतिष सानन्दा भाष्यो गर्ग संहिताछन्दा ||9||
तेहि ऋषि कुल भै भूप आने का यकते एक सुनीति निकेता ||10||
जौसव वंश सविस्तार कहंऊ बाढै ग्रन्थ पार नहि लहऊ ||11||
ताते मैं अति अल्प बखानो थोरे महं जानिहैं सयाने ||12||
गर्ग गोत्रा क्षत्रि कहवायो निर्मल जश भूमंडल छायो ||13||

दोहाः
यहि कुल कमल प्रकाश भो। राम शाह अस भूप ||
जिनके द्वैव सुत विदित जग। भारा कीर्ति स्वरूप ||
दलि मलेच्छ यहि देश-दीन्हों राज बसाय
भारा भल मूंगर वसे कीरत शाह निहांव




गोत्रावली

गोत्रा- गर्ग
वेद- यजुर्वेद
उपवेद- धनुर्वेद
शाखा- माध्यंदिनी
प्रवर- गर्ग, गार्गेय, मलिकर्मा



गर्गवंशावली

किसी राज भट्ट द्वारा सैकड़ों वर्ष पहले कवित्त में लिखा गया कुछ पन्ना अचानक 2006 में श्री रूद्र प्रताप सिंह के बक्सों से बड़ी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में प्राप्त हुआ उसके अनुसार-

गर्ग चलेउ कलयुग में, रामचन्द्र के पास
अवधपुरी नगिचात कै, धोती लागि आकाश
आवत कै प्रणाम कीन्ह प्रभु कुश गंगा जल लीन
अगर पदारथ पाँव पूजि कुश भवन वास दैदीन
करि निवास दशरथपुरी-गर्गऋषि सखा समेत
आदर करि सादर कियो-निशि वासर कृपा निकेत
यहि विधि वर्ष सहस्रनव-और न दूसर साविका
गर्ग वंश ते धर्म हो-और न दूसर आसिका
ताके है दरवार मंे नृपति वांह सब लेय
वार पार ले जो बसै सो अकोर सब देय


चैपाई-गर्गवंशावली

नृप विराध कौशलपुर राजा-चन्द्र वंश महि मंडल साजा
ता को सुता सागरा रानी-भयो विवाह धर्म कै खानी
लक्षण राज सुमंत्रा विशेषा-अंग अंग परखे गुण दोषा
विधि संयोग सागरा केरी-दियो सुमंत्रा विवाहि सुखेरी
क्षत्राी धर्म लोक मर्जादा-राजनीति पूरण डिढ़ काजा
ता के जगपति भै जगवंता-रानी कोकिला ब्याह बसंता
ताके धर्म रूप सुत भयऊ-रामशाह नामी हरि कहेऊ



गर्गवंशावली

1. सुमंत्राशाह, रजवंतशाह, 2. भगवंतशाह, 3. धर्मवंतशाह, 4. मंगलशाह, 5. धनाशाह, 6. मानशाह, 7. ब्यानशाह, 8. वीरशाह, 9. धीरमशाह, 10. गोशाईराय, 11. राम रूप शाह, 12. हरबिंशराय, 13. जदुवंशराय, 14. कुलवंतराय, 15. मटुकराय, 16. हिवंचलशाह, 17. मकरंदशाह, 18. आजितराय, 19. कांधेराय, 20. जमुनाशाह, 21. गोभराय, 22. जीननराय, 23. भीलमराय, 24. राजशाह, 25. प्रतापशाह, 26. गंगाराय, 27. वृसेनराय 28. पृथ्वीराय, 29. गणपतिराय, 30. भैरोराय, 31. शीतलराय, 32. मथुरा राय, 33. चन्द्र मणि-सूर्यमणि, 34. भारामल राजमल, बुझावनशाह, कीरतशाह, पारसनाथ राय (5 पुत्रा)।

कीतरशाह के छीतमराय, मोतिमराय 2 पुत्रा मोतिमराय के ऊधनराय महगूराय 2 पुत्रा ऊधराय के तासराय, नाथराय, विभाराय बदरीराय 4 पुत्रा। तासराय के आसकरनराय, तोड़रशाह 2 पुत्रा। महगूराय के बीरभानराय के दलहूराय के हरीराम रूप नरायन कनकराय दामोदरशाह केशवराय जीवनराय इतना पुराने लेख में अंकित है।

सृष्टि के प्रारम्भ में दो ही प्रकार क्षत्रिय थे ब्रह्मा के नेत्रा से पैदा होने वाले चन्द्रवंश तथा पांव से पैदा होने वाले सूर्यवंश कहलाए।

इसके बाद चार पुनः चार से क्षत्रियों के 36 वंश विकसित हुए।

दस रवि सो दस चन्द्र से द्वादस ऋषिभ प्रमान

चार हुतासन यज्ञ से यह छत्तीसी जान

वर्तमान समय में उपरोक्त साखाओं के विकास से हजारों प्रकार के क्षत्रिय हो चुके है।